भगवान शिव ने की थी पल्लू शिवालय में आराधना
कस्बे में स्थित शिवालय में सोमवार को श्रद्धालुओं को भारी भीड़ रही। सुबह से ही शिवमंदिर पर श्रद्धालुओं को मंदिर पर आगमन प्रारंभ हो गया जो दिन भर चला। कस्बें सहित आसपास के गांवों से आये श्रद्धालुओं ने शिवालय में पहुंचकर मन्नतें मांगी। श्रद्धालु भोले शंकर को खुश करने के लिये तरह-तरह के भोग तथा बेल पत्र चढ़ाकर शीश नवाया। वहीं पुजारी से चरणामृत रूपी प्रसाद लिया। राजेश शास्त्री व पुजारी हनुमान गोस्वामी ने मंत्रोपच्चार किया जिसके बाद श्रद्धालुओं का सिलसिला शुरू हो गया। मंदिर के शस्त्री ने बताया कि आज के दिन उपवास करने वाले श्रद्धालु यहां आकर भजन कीर्तन करते है तथा रात्री को विशाल जागरण का आयोजन किया जाता है। इस दौरान मंदिर कमेटी सोमवार दिनभर मंदिर के प्रांगण में सजावट में लगी रही। समिति के कानसिंह राठौड़ ने बताया कि शाम को विशाल जागरण होगा जिसके बाद मंगलवार सुबह हवन होगा। जिसकी पुरी तैयारी कमेटी द्वारा की गई है।

पल्लू स्थित शिवालय मंदिर भी मां ब्रह्माणी मंदिर के समान ही महत्व रखता है। इस मंदिर का इतिहास भी मां ब्रह्माणी मंदिर के साथ ही शुरू होता है। इस मंदिर के इतिहासकार बताते है कि पल्लू आबाद से पहले पल्लू के राजा कुलर थे जो मां ब्रह्माणी के परम भक्त थे। इस किले पर फतेह हासिल करने के लिये रंगमहल के राजा फूल ने कई बार आक्रमण किया मगर हर बार उन्हें हार का सामना करना पड़ा। राजा कूलर का यह किला 88 बीघा भुमि में बना था। और कूलर को मां ब्रह्माणी का अजेय वरदान हासिल था। अंत में आक्रमण कारी राजा फूल थक हार मरणासन्न की शैया पर पहुंच गया। तभी उसने अपने पुत्र लाखा को बुलाकर उनकी अंतिम इच्छा कोट कलूर को जीतने की पुरी करने की कही। इस पर शिव भक्त लाखा ने 12 वर्षों तक शिवशंकर की कठोर तपस्या कर कोट कलूर किले को फतेह करने का वरदान प्राप्त किया। और कोट कलहूर पर चढ़ाई कर दी। मगर अड़चन ये थी कि राजा कूलर को अजेय वरदान मां ब्रह्माणी से प्राप्त था और उधर शिव ने दुश्मन को फतेह का वरदान दे दिया। विकट समस्या को देखकर मां ब्रह्ह्माणी ने राजा कूलर को ये किला छोड़ कही और चले जाने को कह दिया। उधर लाखा के निवेदन पर भगवान शिव ने पल्लू स्थित शिवालय वाले स्थान पर उस समय अपना धुणा लगाया था। उस समय मां ब्रह्माणी ने विकट स्थिति में उस किले को राजा कूलर सहित जमींदोज कर दिया था। जिस पर आक्रमणकारी राजा लाखा को यहां से कुछ प्राप्त नहीं हो सका। हां भगवान शिव के वरदान के चलते उसने इस किले को नष्ट जरूर करवा दिया था। विक्रम संम्वत 1365 में पल्लू कस्बा पुन: आबाद होना शुरू हुआ । जिसके बाद से जहां मां ब्रह्माणी का मंदिर है उस स्थान पर मां ब्रह्माणी तीनों मुर्ति तथा शिवालय के स्थान शिवलिंग मिला था। जिसको समय के अनुसार संजोये रखने केलिये दिनों दिन नया रूप मिलता गया। इतिहास में वर्णित कथाओं में पल्लू स्थित शिवालय को महत्व स्थान दिया गया है। ऐसे में इस मंदिर से लोगों की आस्थाऐ विशेष रूप से जुड़ी हुई है।

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